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उज्जयिनी का प्राचीन इतिहास

महाकाल सवारी ....... 200 साल पुरानी परंपरा, हर साल बढ़ रही भव्यता

उज्जैन को देवताओं की नगरी कहा जाता है यहां कई ऐसी धार्मिक परपराए प्रचलित है जो अब शहर की संस्कृति से जुड़कर धार्मिक त्योहार का रूप ले चुकी है। वह परपराएं अब शहर की पहचान के रूप में स्थापित हो चुकी है। इनके बिना उज्जैन की संस्कृति की कल्पना करना संभव नहीं है। इन परपराओं में वर्ष भर में देवताओं की समय-समय पर निकाली जाने वाली सवारियों की परंपरा भी एक है। श्रावण व भादौ मास में निकाली जाने वाली भगवान महाकाल की सवारी इसका एक मुख्य उदाहरण है। सवारी निकालने की शुरूआत सिंधिया शासन काल में बायजा बाई ने करीब 200 वर्ष पूर्व की थी। यह परंपरा अब भव्य रूप ले चुकी है। बाबा महाकाल की प्रत्येक सवारी में लाखों दर्शनार्थी दर्शन लाभ ले रहे है।

भव्य होता सवारी का स्वरूप : सवारी का स्वरूप प्रारंभ में इतना भव्य नहीं था, भगवान की सवारी गोपाल मंदिर तक आकर लौट जाती थी, लेकिन धीरे-धीरे इसके स्वरूप में परिवर्तन होता गया और वर्तमान में अब भगवान महाकाल की सवारी निकाली जाने की परंपरा लोकोत्सव का रूप ले चुकी है। भादों मास के दूसर सोमवार को निकाली जाने वाली भगवान महाकाल की शाही सवारी अब अत्यंत भव्यता के साथ निकाली जाती है।

महाकाल पूजते है शिप्रा को : इसी प्रकार कार्तिक माह में भी प्रत्येक सोमवार को भगवान महाकाल की सवारी निकाली जाने की परंपरा है। इस परंपरा की शुरूआत किसने की, इसकी कोई अधिकृत जानकारी नहीं है ऐसी मान्यता है कि कार्तिक माह में क्षिप्रा स्नान व पूजन का अधिक महत्व है, भगवान महाकाल भी क्षिप्रा पूजन के लिए क्षिप्रा तट आते है।

वर्ष में एक बार नए शहर का भ्रमण : भगवान महाकाल की सवारी वर्ष में एक बार दशहरे के दिन फ्रीगंज पुल पार कर नए शहर में आती है। इस दिन बाबा महाकाल दशहरा मैदान पहुंचकर शमी के वृक्ष का पूजन करते है।

सवारी के रूप में हर जाते है हरि से मिलने : वर्ष में एक बार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को भगवान महाकाल की सवारी गोपाल मंदिर आती है यहां हर (महाकाल) व हरि (विष्णु) का मिलन होता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शंकर आज के दिन सृष्टि का भार भगवान विष्णु को सौंपने आते है।

देवी पार्वती की सवारी : अश्विन मास में श्राद्ध पक्ष के दौरान महाकाल मंदिर में उमा-सांझी महोत्सव मनाया जाता है। 5 दिन तक चलने वाले इस महोत्सव के बाद समापन अवसर पर देवी पार्वती की सवारी निकाली जाती है। रामघाट पर संजा विसर्जन पर सवारी पुनः मंदिर लौट आती है।

सेनापति की सवारी : वर्ष में एक बार भैरव अष्टमी के अवसर पर महाकाल के सेनापति काल भैरव की सवारी निकाली जाती है। इस सवारी का प्रारंभ भी सिंधियाओं द्वारा किया गया था। जनता का हाल जानने निकले सेनापति सिर्फ भैरवगढ़ क्षेत्र में ही भ्रमण करते है।